Actor Salman Khan’s NGO facing blacklisting!


Bollywood star Salman Khan’s Being Human Foundation, a charity outfit that works for the underprivileged in the education and healthcare sectors, is likely to be blacklisted by the Brihanmumbai Municipal Corporation (BMC) for not operating a dialysis centre in Bandra.

After issuing two show-cause notices to the NGO last month, the BMC’s health department is now in the process of blacklisting it.

When contacted, an official with Foundation, who did not want to be identified, said: “We do not wish to say anything.”

Dr Padmaja Keskar, BMC’s executive health officer, confirmed that the Foundation is being blacklisted as it has done nothing to start operations at the centre, which has been lying closed and unused since it was set up and handed over to the NGO in 2016. The centre is supposed to offer the medical facility to citizens at minimum cost.

In July 2016, following a tendering process, the NGO was allotted a 250 square metre space at Bandra’s St John Road to run 24 dialysis machines in a public-private partnership basis. “The project was never been implemented. After we sent them a reminder last December, the Foundation responded saying it cannot run the dialysis centre owing to some difficulty,” said Keskar. “We will now issue a notice to blacklist the Foundation.”

The BMC sent two letters to the Bollywood actor’s NGO, on January 6 and January 18, warning the organisation that it would be blacklisted for “showing negligence” after bidding for the project.

As there has been no positive response, the BMC is now refloating tenders for the dialysis centre. Once the Foundation is blacklisted, it cannot bid for the same project again.

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Towards honking free Chandigarh!

In a bid to make the city noise pollution-free, the Chandigarh Traffic Police have initiated a no-honking campaign under which motorists will be sensitised about it and administered a pledge to support the campaign.

The police are also distributing stickers, meant for steering wheels of vehicles with ‘I will not honk’ written on these. The traffic police also encouraged people by asking them to tweet pictures of the steering wheel of their car with a sticker on it. Notably, the campaign was started on January 1.

The traffic policed will start challaning the motorists who will be found honking unnecessarily. The challans will be issued in silence zones-Sector 1 Capitol Complex, Sector 12, Sector 14, and the roads near hospitals and educational institutes, where honking is prohibited.

The traffic police will use body-fitted cameras to record the violations after which the offender will be booked under Section 177of the Motor Vehicles Act and will be fined Rs 1,000. The challaning drive will be conducted in the presence of a traffic marshal.

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SC seeks ideas from NGO to enforce anti-sexual harassment law at workplace

SC seeks ideas from NGO to enforce anti-sexual harassment law at workplace

The Supreme Court on Friday asked the NGO Initiative for Inclusion Foundation (IIF) to give suggestions for the effective implementation of a law to curb sexual harassment of women at workplaces, particularly in the private sector.

A bench of Chief Justice Dipak Misra, Justice A.M. Khanwilkar and Justice D.Y. Chandrachud sought the suggestions after the Centre in its affidavit claimed that it has taken steps to enforce the Protection of Women from Sexual Harassment at Workplace (Prevention, Prohibition and Redressal) Act, 2013.

Appearing for the IIF, senior counsel Sanjay Parikh said there was no implementation of the law in private companies.

He said a meeting was held with ASSOCHAM four years ago but nothing happened later.

The IIF has sought to put in place the guidelines for the implementation of the law at all levels.


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Baba Amte (1914-2008).jpg

समाज सेवक

बाबा आम्टे


बाबा आम्टे

पूरा नाम

मुरलीधर देवीदास आम्टे


24 दिसम्बर, 1914

जन्म भूमि



9 फ़रवरी, 2008

मृत्यु स्थान





सामाजिक कार्यकर्ता


‘क्रिस्चियन मिशन स्कूल’, नागपुर; ‘नागपुर विश्वविद्यालय’


एम.ए., एल.एल.बी.


‘पद्मश्री’ (1971), ‘राष्‍ट्रीय भूषण’ (1978), ‘पद्म विभूषण’ (1986), ‘मैग्‍सेसे पुरस्‍कार’ (1988), ‘बिड़ला पुरस्कार’, ‘महात्मा गांधी पुरस्कार’।

विशेष योगदान

कुष्ठ रोगियों के लिए बाबा आम्टे ने सर्वप्रथम ग्यारह साप्ताहिक औषधालय स्थापित किए, फिर ‘आनंदवन’ नामक संस्था की स्थापना की।


बाबाजी ने 1985 में कश्मीर से कन्याकुमारी तक और 1988 में असम से गुजरात तक दो बार ‘भारत जोड़ो आंदोलन’ चलाया।


अन्य जानकारी
बाबा आम्टे को बचपन में माता-पिता ‘बाबा’ पुकारते थे। इसलिए बाद में भी वे बाबा आम्टे के नाम से प्रसिद्ध हुए।
बाबा आम्टे पूरा नाम ‘मुरलीधर देवीदास आम्टे’ (अंग्रेज़ी: Baba Amte, जन्म: 24 दिसंबर[1] 1914 महाराष्ट्र – मृत्यु: 9 फरवरी 2008 महाराष्ट्र) विख्यात सामाजिक कार्यकर्ता, मुख्‍यत: कुष्‍ठरोगियों की सेवा के लिए विख्‍यात ‘परोपकार विनाश करता है, कार्य निर्माण करता है’ के मूल मंत्र से उन्‍होंने हजारों कुष्‍ठरोगियों को गरिमा और साथ ही बेघर तथा विस्‍थापित आदिवासियों को आशा की किरण दिखाई दी।
जन्म एवं परिवार
विख्यात समाजसेवक बाबा आम्टे का जन्म 24 दिसंबर, 1914 ई. को वर्धा महाराष्ट्र के निकट एक ब्राह्मण जागीरदार परिवार में हुआ था। पिता देवीदास हरबाजी आम्टे शासकीय सेवा में थे। उनका बचपन बहुत ही ठाट-बाट से बीता। वे सोने के पालने में सोते थे और चांदी की चम्मच से उन्हें खाना खिलाया जाता था। बाबा आम्टे को बचपन में माता-पिता ‘बाबा’ पुकारते थे। इसलिए बाद में भी वे बाबा आम्टे के नाम से प्रसिद्ध हुए। बाबा आम्टे के मन में सबके प्रति समान व्यवहार और सेवा की भावना बचपन से ही थी। 9 वर्ष के थे तभी एक अंधे भिखारी को देखकर इतने द्रवित हुए कि उन्होंने ढेरों रुपए उसकी झोली में डाल दिए थे।
बाबा आम्टे का विवाह भी एक सेवा-धर्मी युवती साधना से विचित्र परिस्थितियों में हुआ। बाबा आम्टे को दो संतान प्राप्त हुई प्रकाश आम्टे, एवं विकास आम्टे।
बाबा आम्टे ने एम.ए., एल.एल.बी. तक की पढ़ाई की। उनकी पढ़ाई क्रिस्चियन मिशन स्कूल नागपुर में हुई और फिर उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय में क़ानून की पढ़ाई की और कई दिनों तक वर्धा में वकालत करने लगे। परंतु जब उनका ध्यान अपने तालुके के लोगों की गरीबी की ओर गया तो वकालत छोड़कर वे अंत्यजों और भंगियों की सेवा में लग गए।
समाज सुधार
1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जेल गए। नेताओं के मुकदमें लड़ने के लिए उन्‍होंने अपने साथी वकीलों को संगठित किया और इन्‍ही प्रयासों के कारण ब्रिटिश सरकार ने उन्‍हे गिरफ्तार कर लिया, लेकिन वरोरा में कीड़ों से भरे कुष्‍ठ रोगी को देखकर उनके जीवन की धारा बदल गई। उन्‍होंने अपना वकालती चोगा और सुख-सुविधा वाली जीवन शैली त्‍यागकर कुष्‍ठरोगियों और दलितों के बीच उनके कल्‍याण के लिए काम करना प्रारंभ कर दिया।
आनंद वन की स्‍थापना
बाबा आम्टे ने कुष्ठ रोग से पीड़ित लोगों की सेवा और सहायता का काम अपने हाथ में लिया। कुष्ठ रोगियों के लिए बाबा आम्टे ने सर्वप्रथम ग्यारह साप्ताहिक औषधालय स्थापित किए, फिर ‘आनंदवन’ नामक संस्था की स्थापना की। उन्होंने कुष्ठ की चिकित्सा का प्रशिक्षण तो लिया ही, अपने शरीर पर कुष्ठ निरोधी औषधियों का परीक्षण भी किया। 1951 में ‘आनंदवन’ की रजिस्ट्री हुई। सरकार से इस कार्य के विस्तार के लिए भूमि मिली। बाबा आम्टे के प्रयत्न से दो अस्पताल बने, विश्वविद्यालय स्थापित हुआ, एक अनाथालय खोला गया, नेत्रहीनों के लिए स्कूल बना और तकनीकी शिक्षा की भी व्यवस्था हुई। ‘आनंदवन’ आश्रम अब पूरी तरह आत्मनिर्भर है और लगभग पाँच हज़ार व्यक्ति उससे आजीविका चला रहे हैं।
भारत जोड़ो आंदोलन
बाबा आम्‍टे ने राष्‍ट्रीय एकता को बढ़ावा देने के लिए 1985 में कश्मीर से कन्याकुमारी तक और 1988 में असम से गुजरात तक दो बार भारत जोड़ो आंदोलन चलाया। नर्मदा घाटी में सरदार सरोवर बांध निर्माण और इसके फलस्‍वरूप हजारों आदिवासियों के विस्‍थापन का विरोध करने के लिए 1989 में बाबा आम्‍टे ने बांध बनने से डूब जाने वाले क्षेत्र में निजी बल (आंतरिक बल) नामक एक छोटा आश्रम बनाया।
बाबा आम्टे को उनके इन महान् कामों के लिए बहुत सारे पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया। उन्हें मैगसेसे अवॉर्ड, पद्मश्री, पद्मविभूषण, बिड़ला पुरस्कार, मानवीय हक पुरस्कार, महात्मा गांधी पुरस्कार के साथ-साथ और भी कई पुरस्कारों से नवाजा गया।
• 1971 में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री
• 1978 में राष्‍ट्रीय भूषण
• 1983 में अमेरिका का डेमियन डट्टन पुरस्कार
• 1985 में मैग्‍सेसे पुरस्‍कार
• 1986 में पद्म विभूषण
• 1988 में घनश्यामदास बिड़ला अंतरराष्ट्रीय सम्मान
• 1988 में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार सम्मान
• 1990 में अमेरिकी टेम्पलटन पुरस्कार
• 1991 में ग्लोबल 500 संयुक्त राष्ट्र सम्मान
• 1992 में राइट लाइवलीहुड सम्मान
• 1999 में गाँधी शांति पुरस्कार
• 2004 में महाराष्ट्र भूषण सम्मान[2]
भारत के विख्यात समाजसेवक बाबा आम्टे का निधन 9 फरवरी, 2008 को 94 साल की आयु में चन्द्रपुर ज़िले के वड़ोरा स्थित अपने निवास में निधन हो गया।

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Child Friendly Courts suggested by SC

The Supreme Court’s judgement came on a PIL seeking implementation of the Juvenile Justice Act and its rules.


The Supreme Court on Friday passed a slew of directions for effective implementation of the Juvenile Justice Act and asked the Centre and states to ensure that all positions in national and state commissions for the protection of child rights are filled up.

A bench of justices Madan B Lokur and Deepak Gupta also directed the states to ensure that all positions in juvenile justice boards and child welfare committees are filled up expeditiously and in accordance with rules.

Any delay in filling up the positions might adversely impact children and this should be avoided, the bench said.

The top court also requested the chief justices of all high courts to register proceedings on their own for effective implementation of the Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act, 2015.

It asked all the high courts to seriously consider establishing child-friendly courts and vulnerable witness courts in each district.

“The ministry of women and child development in the government of India and the state governments should ensure that all positions in the National Commission for Protection of Child Rights (NCPCR) and the State Commissions for Protection of Child Rights (SCPR) are filled up well in time and adequate staff is provided to these statutory bodies so that they can function effectively and meaningfully for the benefit of the children,” the bench said.

The apex court’s judgement came on a PIL seeking implementation of the Juvenile Justice Act and its rules. The petition has raised the issue of alleged apathy by the governments in implementing the welfare measure.

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